देसीटून्ज़

दिसम्बर 24, 2006

जुलाहों में लट्ठम लट्ठा…

Filed under: आदम और हव्वा... — raviratlami @ 9:25 पूर्वाह्न

आदम और हव्वा…

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7 टिप्पणियाँ »

  1. हम्म्म!!!
    बहुत सही।

    टिप्पणी द्वारा जगदीश भाटिया — दिसम्बर 24, 2006 @ 11:33 पूर्वाह्न

  2. सपने देखना कहाँ बुरा है?

    टिप्पणी द्वारा संजय बेंगाणी — दिसम्बर 24, 2006 @ 12:05 अपराह्न

  3. दिल बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है

    टिप्पणी द्वारा bhuvnesh — दिसम्बर 24, 2006 @ 1:44 अपराह्न

  4. सत्ता वो गाजर है जिसकी उम्मीद में सारे खरगोश फुदकते रहते हैं. ये भी फुदक लें. 😉

    टिप्पणी द्वारा शशि सिंह — दिसम्बर 24, 2006 @ 3:23 अपराह्न

  5. 🙂 अभी यही समाचार देख रहा था. 🙂

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल — दिसम्बर 24, 2006 @ 11:55 अपराह्न

  6. 🙂

    टिप्पणी द्वारा अनूप शुक्ला — दिसम्बर 25, 2006 @ 3:45 पूर्वाह्न

  7. दूसरे शब्दों में – “गांव बसा नहीं चोर-उचक्के पहले आ गये” 🙂

    टिप्पणी द्वारा Shrish — दिसम्बर 25, 2006 @ 4:21 पूर्वाह्न


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