अरे भईया,
हमें तो लगा कि “जाँच प्रविष्टी” का बहाना बनाया हुआ है, और यहाँ असल में “कुछ” तो लिखा होगा. हमें लगा कि ये आपकी ईश्टाईल होगी.
पर यहाँ आये तो पता पड़ा कि ये तो वाकई एक “जाँच प्रविष्टी” ही है. बड़ी निराशा हुई.
आप से अनुरोध है कि आगे से “जाँच प्रविष्टी” पर भी कम से कम एक-आध चुटकुला तो डाल ही दें. आने वाले को निराशा तो न होगी.
Comment by vijay wadnere — June 27, 2007 @ 1:00 pm
http://www.geocities.com/shubham_katare/phoolkhile.wav सखि! आये दिन गर्मी तपास के फूल खिले अमलताश के ।।
कैसो मौसम हो गयो बैरी काटे कटती नहीं दुपहरी सूरज बन के बैठो पहरी मीत लगें घने पेड़ आसपास के। फूल खिले अमलताश के ।।
कैसी मौसम की मजबूरी भावे हलुआ खीर न पूरी रहती हरदम प्यास अधूरी देह दुबली सी भई बिन प्रयास के।। फूल खिले अमलताश के ।।
पूरी नींद न होय हमारी आँखें हो गयीं भारी भारी कैसे कैसे रात गुजारी भये सैंयाँ भी ऊपर पचास के। फूल खिले अमलताश के ।।
Comment by shastri nityagopal katare — June 27, 2007 @ 6:49 pm
ठीक है जी अनदेखा कर दिया है।
वैसे आपने प्रविष्टि में चिट्ठाजगत.इन संबंधी कुछ परीक्षण किया है।
Comment by Shrish — June 27, 2007 @ 7:18 pm
kyon na dekkhen jii, javo nahi dekhte^_^
Comment by aakashpriya — August 17, 2007 @ 10:04 am
ye to kafi samay se andekha hi lag raha hai kyonki 17 august 2007 ke baad main hi dikh raha hoon.
Comment by murlidhar hasani — August 27, 2009 @ 4:37 pm
time bhi wrong aa raha hai is samay raat ke 10-15 baj rahe hain.
Comment by murlidhar hasani — August 27, 2009 @ 4:39 pm
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अरे भईया,
हमें तो लगा कि “जाँच प्रविष्टी” का बहाना बनाया हुआ है, और यहाँ असल में “कुछ” तो लिखा होगा.
हमें लगा कि ये आपकी ईश्टाईल होगी.
पर यहाँ आये तो पता पड़ा कि ये तो वाकई एक “जाँच प्रविष्टी” ही है.
बड़ी निराशा हुई.
आप से अनुरोध है कि आगे से “जाँच प्रविष्टी” पर भी कम से कम एक-आध चुटकुला तो डाल ही दें.
आने वाले को निराशा तो न होगी.
Comment by vijay wadnere — June 27, 2007 @ 1:00 pm
http://www.geocities.com/shubham_katare/phoolkhile.wav
सखि! आये दिन गर्मी तपास के
फूल खिले अमलताश के ।।
कैसो मौसम हो गयो बैरी
काटे कटती नहीं दुपहरी
सूरज बन के बैठो पहरी
मीत लगें घने पेड़ आसपास के।
फूल खिले अमलताश के ।।
कैसी मौसम की मजबूरी
भावे हलुआ खीर न पूरी
रहती हरदम प्यास अधूरी
देह दुबली सी भई बिन प्रयास के।।
फूल खिले अमलताश के ।।
पूरी नींद न होय हमारी
आँखें हो गयीं भारी भारी
कैसे कैसे रात गुजारी
भये सैंयाँ भी ऊपर पचास के।
फूल खिले अमलताश के ।।
Comment by shastri nityagopal katare — June 27, 2007 @ 6:49 pm
ठीक है जी अनदेखा कर दिया है।
वैसे आपने प्रविष्टि में चिट्ठाजगत.इन संबंधी कुछ परीक्षण किया है।
Comment by Shrish — June 27, 2007 @ 7:18 pm
kyon na dekkhen jii, javo nahi dekhte^_^
Comment by aakashpriya — August 17, 2007 @ 10:04 am
ye to kafi samay se andekha hi lag raha hai kyonki 17 august 2007 ke baad main hi dikh raha hoon.
Comment by murlidhar hasani — August 27, 2009 @ 4:37 pm
time bhi wrong aa raha hai is samay raat ke 10-15 baj rahe hain.
Comment by murlidhar hasani — August 27, 2009 @ 4:39 pm