देसीटून्ज़

November 26, 2006

मेनका का तोड़

Filed under: रूपहला सच — debashish @ 6:10 pm

Akbar-Jodha

3 Comments »

  1. सही है!! अब क्या करेंगे??

    Comment by समीर लाल — November 27, 2006 @ 12:16 am

  2. अच्छा व्यंग्य. :)
    अति बहुत बुरे परिणाम लेकर आती है, प्राणी अत्याचार के प्रति मेनकाजी का रूख भी अति की सीमा में जाने लगा है.

    Comment by संजय बेंगाणी — November 27, 2006 @ 5:07 am

  3. मेनका की मिन-मिन से अभी भी लोग प्रभावित होते है, अचरज है।

    Comment by ratna — November 28, 2006 @ 7:11 am


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